मुंबई में मराठी अस्मिता पर संकट? 25 साल की सत्ता के बाद उठे तीखे सवाल

Marathi identity under threat in Mumbai: संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन की विरासत से बनी मुंबई में आज मराठी समुदाय के अस्तित्व, आवास और आर्थिक हिस्सेदारी पर गंभीर बहस संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन में शहीद हुए 106 वीरों के बलिदान से अस्तित्व में आई देश की आर्थिक राजधानी मुंबई आज एक बार फिर मराठी अस्मिता को लेकर चर्चा […]
Khushi
By : Updated On: 08 Jan 2026 14:43:PM
मुंबई में मराठी अस्मिता पर संकट? 25 साल की सत्ता के बाद उठे तीखे सवाल

Marathi identity under threat in Mumbai: संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन की विरासत से बनी मुंबई में आज मराठी समुदाय के अस्तित्व, आवास और आर्थिक हिस्सेदारी पर गंभीर बहस

संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन में शहीद हुए 106 वीरों के बलिदान से अस्तित्व में आई देश की आर्थिक राजधानी मुंबई आज एक बार फिर मराठी अस्मिता को लेकर चर्चा के केंद्र में है। सवाल यह है कि जिस शहर पर मराठी मानुष के संघर्ष की नींव है, वहीं आज मराठी समुदाय खुद को हाशिए पर क्यों महसूस कर रहा है?

करीब ढाई दशकों तक मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) पर शिवसेना का वर्चस्व रहा। इस लंबे कार्यकाल के बाद अब आम मराठी नागरिक यह पूछने लगा है कि क्या सत्ता के इन वर्षों में मराठी समाज वास्तव में आगे बढ़ा या उसकी स्थिति और कमजोर हुई?

मिल इलाकों से कांच के टावरों तक बदली मुंबई

लालबाग, परेल, दादर, गिरगांव और शिवड़ी जैसे इलाके कभी मुंबई की सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान थे। मिल मजदूरों की मेहनत और मराठी संस्कृति से बने इन क्षेत्रों ने बीते 25–30 वर्षों में पूरी तरह नया रूप ले लिया। बंद पड़ी मिलों की जगह अब ऊंची-ऊंची इमारतें और लग्जरी टावर खड़े हैं।

आरोप है कि पुनर्विकास के नाम पर मराठी निवासियों को यहीं घर देने के वादे किए गए, लेकिन हकीकत में बड़ी संख्या में मराठी परिवारों को विरार, बदलापुर, कर्जत, कसारा और अन्य बाहरी इलाकों में जाना पड़ा। जिनके नाम पर राजनीति हुई, वही शहर के केंद्र से धीरे-धीरे बाहर होते चले गए।

आर्थिक सशक्तिकरण पर सवाल

बीएमसी का सालाना बजट 50 हजार करोड़ रुपये से अधिक है और पिछले 25 वर्षों में यह राशि लाखों करोड़ तक पहुंच चुकी है। इसके बावजूद सवाल उठता है कि इस धन से कितने मराठी ठेकेदार, उद्योगपति या बड़े उद्यमी उभर सके?

आरोप लगाए जा रहे हैं कि ठेकेदारी, निर्माण और बुनियादी ढांचे की परियोजनाओं में स्थानीय मराठी युवाओं को प्राथमिकता नहीं मिली। मराठी समाज आज भी छोटे व्यवसायों तक सीमित है, जबकि बड़े आर्थिक नियंत्रण कुछ चुनिंदा प्रभावशाली वर्गों के हाथों में रहे।

नारों की राजनीति और जमीनी हकीकत

‘मराठी मानुष’, ‘मराठी अस्मिता’ और ‘मुंबई हमारी है’ जैसे नारे चुनावों में असरदार रहे, लेकिन सत्ता में रहते हुए ये नारे ठोस नीतियों में नहीं बदल पाए, ऐसी आलोचना सामने आ रही है।

इसका उदाहरण मराठी माध्यम के स्कूलों की स्थिति है। मनपा के कई मराठी स्कूल बंद हुए या छात्र संख्या घटती गई, जबकि निजी अंग्रेजी माध्यम के स्कूल तेजी से बढ़े। इससे मराठी शिक्षा व्यवस्था के भविष्य पर भी सवाल खड़े हो गए हैं।

रोज़ का सफर, बढ़ती मुश्किलें

आज हजारों मराठी कर्मचारी ठाणे, पालघर और रायगढ़ जिलों से रोज़ 4–5 घंटे की यात्रा कर मुंबई पहुंचते हैं। आरोप है कि किफायती आवास की ठोस योजना न होने से मराठी कामगार शहर में रहने का सपना ही छोड़ने को मजबूर हो गए। पुनर्विकास से बिल्डरों को लाभ हुआ, जबकि मूल निवासी शहर से बाहर धकेले गए।

चुनावी माहौल और बदलता मतदाता

आगामी महानगरपालिका चुनावों से पहले एक बार फिर मराठी हितों की बात जोर-शोर से हो रही है। लेकिन इस बार मतदाता भावनाओं से आगे बढ़कर जवाब मांगता दिख रहा है। रोज़गार, शिक्षा और घर—ये तीन सवाल मराठी मतदाता के लिए अब सबसे अहम बन गए हैं।

घटती मराठी आबादी: एक बड़ी चेतावनी

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मुंबई में मराठी आबादी का प्रतिशत घटना केवल जनसांख्यिकीय बदलाव नहीं, बल्कि नीतिगत विफलता का संकेत है। लंबे समय तक सत्ता में रहने के बावजूद यदि मूल समुदाय खुद को असुरक्षित महसूस कर रहा है, तो यह गंभीर आत्ममंथन का विषय है।

अब मराठी युवा साफ कह रहा है—भावनात्मक भाषणों से नहीं, बल्कि ठोस नीतियों और अवसरों से भविष्य तय होगा।

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