एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल से फ्यूल टैंक में जम रही काली फंगस
नई दिल्ली: देश में प्रदूषण कम करने और कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता घटाने के उद्देश्य से सरकार द्वारा पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण (Ethanol Blending) की नीति को तेजी से लागू किया जा रहा है। वर्तमान में देश के कई हिस्सों में 20% एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल, यानी E20 ईंधन की आपूर्ति की जा रही है। हालांकि, इस बदलाव के बीच वाहन चालकों, विशेषकर पुरानी गाड़ियों के मालिकों को गंभीर तकनीकी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।
दिल्ली के पालिका भवन में काम करने वाले विक्रम की कहानी इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। विक्रम ने तीन साल पहले एक पुरानी कार खरीदी थी। कार खरीदने के ठीक एक साल बाद ही उनके वाहन के फ्यूल सिस्टम में बड़ी खराबी आ गई। जब उन्होंने मैकेनिक को कार दिखाई, तो पता चला कि उनकी कार का इंजन अधिकतम 10% एथेनॉल (E10) वाले पेट्रोल के लिए ही डिजाइन किया गया था, लेकिन अनजाने में उसमें 20% एथेनॉल वाला E20 फ्यूल लगातार डाला जा रहा था। इस वजह से कार के फ्यूल टैंक और इंजन में भारी खराबी आ गई।

क्यों पैदा हो रही है काली फंगस और जंग की समस्या?
ऑटोमोबाइल विशेषज्ञों और मैकेनिक्स के अनुसार, एथेनॉल रासायनिक रूप से ‘हाइग्रोस्कोपिक’ (Hygroscopic) होता है, जिसका मतलब है कि इसमें हवा से नमी (पानी) को सोखने की अत्यधिक क्षमता होती है।
जब कोई वाहन लंबे समय तक खड़ा रहता है या उसमें एथेनॉल मिश्रित ईंधन भरा रहता है, तो एथेनॉल हवा की नमी को सोखकर पेट्रोल से अलग होने लगता है। इस प्रक्रिया को ‘फेज सेपरेशन’ (Phase Separation) कहा जाता है। ईंधन टैंक के निचले हिस्से में पानी और एथेनॉल का यह मिश्रण जमा हो जाता है, जो समय के साथ एक चिपचिपी काली फंगस या कीचड़ (Sludge) का रूप ले लेता है।
यह काली फंगस फ्यूल पंप और फ्यूल इंजेक्टर्स को ब्लॉक कर देती है। इसके अलावा, नमी के कारण लोहे और स्टील से बने फ्यूल टैंक तथा इंजन के आंतरिक हिस्सों में तेजी से जंग (Rusting) लगने लगती है।
माइलेज में गिरावट और मेंटेनेंस का दोगुना खर्च
E20 ईंधन के इस्तेमाल से वाहन मालिकों को मुख्य रूप से दो बड़ी आर्थिक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है:
- माइलेज में कमी: शुद्ध पेट्रोल के मुकाबले एथेनॉल की ऊर्जा क्षमता (Energy Density) कम होती है। इसके अलावा, फ्यूल सिस्टम में फंगस या कचरा जमा होने से ईंधन का दहन (Combustion) ठीक से नहीं हो पाता। नतीजतन, वाहनों के माइलेज में 10 से 15 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की जा रही है।
- सर्विसिंग का बढ़ता खर्च: जहां पहले सामान्य पेट्रोल से चलने वाली कारों की फ्यूल सिस्टम सर्विसिंग की जरूरत सालों तक नहीं पड़ती थी, वहीं अब मैकेनिक्स के पास ऐसी गाड़ियां हर 6 से 8 महीने में पहुंच रही हैं। फ्यूल टैंक की सफाई, फ्यूल पंप बदलना और इंजेक्टर्स को साफ करने के कारण उपभोक्ताओं का सर्विसिंग का खर्च दोगुना से अधिक हो गया है।
पुरानी गाड़ियों के लिए सबसे बड़ा खतरा
ऑटोमोबाइल जानकारों का कहना है कि साल 2023 से पहले बनी ज्यादातर गाड़ियां E10 (10% एथेनॉल) या शुद्ध पेट्रोल के लिए ही बनाई गई थीं। इन गाड़ियों के फ्यूल टैंक, रबर की पाइपें, और सील एथेनॉल के प्रति संवेदनशील होते हैं।
E20 पेट्रोल में मौजूद उच्च एथेनॉल इन रबर और प्लास्टिक के हिस्सों को धीरे-धीरे गलाने लगता है, जिससे फ्यूल लीक होने का खतरा भी बढ़ जाता है। हालांकि, अप्रैल 2023 के बाद निर्मित नए वाहन ‘E20 कम्प्लाइंट’ (E20 Compliant) हैं, जिनके इंजन और फ्यूल सिस्टम को इस तरह तैयार किया गया है कि वे 20% एथेनॉल को बिना किसी नुकसान के झेल सकें।
वाहन चालक इन समस्याओं से कैसे बचें?
यदि आप भी पुरानी गाड़ी का इस्तेमाल कर रहे हैं, तो विशेषज्ञ निम्नलिखित सावधानियां बरतने की सलाह देते हैं:
- फ्यूल टैंक को खाली न छोड़ें: यदि गाड़ी को कई दिनों तक खड़ा रखना है, तो टैंक को पूरा भरकर रखें ताकि अंदर हवा और नमी के लिए जगह न बचे।
- भरोसेमंद फ्यूल स्टेशन का चुनाव: ऐसे पेट्रोल पंपों से ईंधन लें जहां ईंधन का टर्नओवर ज्यादा हो, ताकि टैंक में पुराना या नमी सोखा हुआ पेट्रोल मिलने की संभावना कम रहे।
- नियमित जांच: यदि गाड़ी के पिकअप में कमी आ रही है या इंजन स्टार्ट होने में समस्या कर रहा है, तो तुरंत फ्यूल फिल्टर और टैंक की जांच करवाएं।
- एंटी-कोरोसिव एडिटिव्स: बाजार में मिलने वाले विशेष फ्यूल एडिटिव्स का उपयोग किया जा सकता है जो फेज सेपरेशन को रोकने और जंग से बचाने में मदद करते हैं।