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वैभव सूर्यवंशी के चयन में ‘न्याय’ मत खोजिए… कहीं अगला सचिन इंतज़ार ही करता न रह जाए!

भारतीय क्रिकेट की अनोखी चुनौती: समस्या ओपनर ढूंढने की नहीं, बल्कि प्रतिभा के सैलाब में से सबसे सर्वश्रेष्ठ को चुनने की है क्या 15-16 साल के इस युवा सनसनी को टीम इंडिया में जल्द मौका मिलना चाहिए? क्रिकेट जगत में छिड़ी बड़ी बहस खेल डेस्क: भारतीय क्रिकेट इस समय एक ऐसी अनोखी समस्या से जूझ […]
Nishant Malyan
By : Updated On: 28 Jun 2026 15:32:PM
वैभव सूर्यवंशी के चयन में ‘न्याय’ मत खोजिए… कहीं अगला सचिन इंतज़ार ही करता न रह जाए!

भारतीय क्रिकेट की अनोखी चुनौती: समस्या ओपनर ढूंढने की नहीं, बल्कि प्रतिभा के सैलाब में से सबसे सर्वश्रेष्ठ को चुनने की है

क्या 15-16 साल के इस युवा सनसनी को टीम इंडिया में जल्द मौका मिलना चाहिए? क्रिकेट जगत में छिड़ी बड़ी बहस

खेल डेस्क:

भारतीय क्रिकेट इस समय एक ऐसी अनोखी समस्या से जूझ रहा है, जिसके लिए दुनिया की ज्यादातर टीमें तरसती हैं। यहाँ चिंता यह नहीं है कि टीम इंडिया का ओपनर (सलामी बल्लेबाज) कौन होगा, बल्कि चिंता यह है कि इतने सारे बेहतरीन विकल्पों में से किसे चुना जाए और किसे छोड़ा जाए। इसी प्रतिभा के सैलाब के बीच, एक नाम सबसे तेजी से उभरकर सामने आया है—वैभव सूर्यवंशी (Vaibhav Sooryavanshi)

वैभव सूर्यवंशी को भारतीय टीम में मौका मिले या नहीं, यह बहस सिर्फ आंकड़ों या रनों की नहीं है। सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या चयन (Selection) में सिर्फ ‘सीनियरिटी’ या ‘न्याय (Fairness)’ देखना ही सही है? इतिहास गवाह है कि अगर हम सिलेक्शन में सिर्फ न्याय और कतार (लाइन) देखते रहते, तो शायद दुनिया को 16 साल की उम्र में ‘सचिन तेंदुलकर’ जैसा महान खिलाड़ी कभी नहीं मिलता।

क्रिकेट में ‘न्याय’ से ज्यादा ‘प्रतिभा की पहचान’ जरूरी

कई बार सिलेक्शन में पारंपरिक न्याय की जगह ‘एक्स-फैक्टर’ (X-Factor) और असाधारण क्षमता को देखना पड़ता है। वैभव सूर्यवंशी ने बेहद छोटी उम्र में जिस आक्रामक अंदाज में बल्लेबाजी की है, उसने दिग्गजों का ध्यान अपनी ओर खींचा है। अगर चयनकर्ता (Selectors) यह सोचकर उन्हें रोके रखें कि “अभी उनकी उम्र छोटी है” या “लाइन में कई सीनियर खिलाड़ी पहले से खड़े हैं”, तो यह भारतीय क्रिकेट के भविष्य के लिए नुकसानदेह हो सकता है। विलक्षण प्रतिभा को आम नियमों के तराजू में नहीं तोला जा सकता।

अगले ‘सचिन’ का इंतज़ार न हो लंबा

जब सचिन तेंदुलकर ने 1989 में पाकिस्तान के खिलाफ डेब्यू किया था, तब भी घरेलू क्रिकेट में कई दिग्गज खिलाड़ी अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे थे। लेकिन चयनकर्ताओं ने सचिन की प्रतिभा को पहचाना और उन्हें सीधे अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट की भट्टी में झोंक दिया। वैभव सूर्यवंशी के मामले में भी आज ऐसे ही साहसिक फैसले की जरूरत है, ताकि देश का अगला सुपरस्टार इंतज़ार करते-करते अपनी चमक न खो बैठे।

टी-20 फॉर्मेट और बेखौफ युवाओं का दौर

मौजूदा समय में क्रिकेट का ढर्रा बदल चुका है। विशेषकर टी-20 क्रिकेट में उम्र या अनुभव से ज्यादा ‘फियरलेस एटीट्यूड’ (निडर अंदाज) और तेज गति से रन बनाने की क्षमता की जरूरत होती है। वैभव सूर्यवंशी जैसे युवा खिलाड़ी बिना किसी पुराने दबाव या इतिहास के अपना स्वाभाविक खेल खेलते हैं। उन पर अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के बड़े नाम का कोई खौफ नहीं होता। इसलिए, उन्हें सही समय पर सही प्लेटफॉर्म देना बीसीसीआई (BCCI) की सबसे बड़ी जिम्मेदारी बन जाता है।

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